Allahabad High Court Gangrape Acquittal: फतेहपुर के 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में तीन आरोपी बरी, हाईकोर्ट ने दिया संदेह का लाभ
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से जुड़े करीब 43 वर्ष पुराने सामूहिक दुष्कर्म और बलवे के एक बहुचर्चित मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीनों जीवित आरोपियों को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के उपरांत पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत ने गवाहों के बयानों में मौजूद गंभीर अंतर्विरोधों, चिकित्सकीय साक्ष्यों के अभाव और घटना के छह दिन बाद दर्ज कराई गई प्राथमिकी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण न होने के आधार पर आरोपी सिराजुल, छोटेलाल और फक्कू की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए फतेहपुर की सत्र अदालत द्वारा वर्ष 1985 में सुनाई गई सजा को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
अभियोजन के अनुसार, यह कथित वारदात 17 अक्टूबर 1983 की रात फतेहपुर जिले के बिंदकी थाना क्षेत्र में घटित हुई थी। आरोप लगाया गया था कि चार नामजद आरोपी दो अज्ञात व्यक्तियों के साथ अवैध हथियारों से लैस होकर एक घर में जबरन घुसे, परिजनों को बंधक बनाया और घर की दो महिलाओं—जो रिश्ते में ननद और भाभी थीं—के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। निचली अदालत ने 22 अप्रैल 1985 को आरोपियों को दोषी करार देते हुए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। चार दशकों से अधिक चले इस लंबे कानूनी संघर्ष के दौरान मुख्य आरोपी मोहम्मद अनीस खान की अपील उसकी मृत्यु हो जाने के कारण मार्च 2026 में ही समाप्त हो चुकी थी, जिसके बाद अदालत ने शेष तीन आरोपियों की दलीलों पर अपना फैसला सुरक्षित किया था।
हाईकोर्ट ने अपने 14 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में स्पष्ट किया कि यद्यपि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है और केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है, लेकिन इसके लिए गवाही का पूरी तरह सुसंगत, विश्वसनीय और निष्कलंक होना अनिवार्य है। अदालत ने रेखांकित किया कि दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटनाक्रम, आरोपियों की मौजूदगी और हमले के तरीके को लेकर बुनियादी विरोधाभास पाए गए, शुरुआत में दो आरोपियों के नाम तक नहीं लिखाए गए थे और न ही घटनास्थल से कोई फॉरेंसिक या चिकित्सकीय साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सके। अदालत ने कहा कि छह दिन की लंबी देरी के बाद दर्ज कराई गई एफआईआर और पुरानी रंजिश के दावों के बीच संदेह का लाभ अभियुक्तों को मिलना न्यायहित में अनिवार्य है, जिसके तहत चार दशक बाद तीनों वृद्ध आरोपियों को कानूनी राहत मिली है।
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