ED vs I-PAC Supreme Court Hearing: सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार के लिए ईडी एफआईआर पर लगाई रोक
ED vs I-PAC Supreme Court Hearing: सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार के लिए ईडी एफआईआर पर लगाई रोक
कोलकाता में आई-पैक कार्यालय पर ईडी की छापेमारी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है, और अदालत ने इस विवादित जांच पर महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य पुलिस के साथ मिलकर ईडी की जांच में साक्ष्य छीनने का प्रयास किया। ईडी ने कोर्ट में यह दावा किया कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारी के लैपटॉप, महत्वपूर्ण दस्तावेज और मोबाइल फोन जबरन जब्त किए। इसके साथ ही ईडी ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस पी.के. मिश्रा की अध्यक्षता में सुनवाई के दौरान ईडी द्वारा दर्ज की गई एफआईआर पर रोक लगाते हुए कहा कि अगली सुनवाई तक कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट ने राज्य सरकार से दो हफ्ते के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि छापेमारी के दौरान प्राप्त सभी सीसीटीवी फुटेज और रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखा जाए ताकि जांच में किसी भी तरह का दबाव या बदलाव न किया जा सके।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पैरवी करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री और राज्य पुलिस अधिकारियों ने ईडी की जांच में दखल दिया। उन्होंने दावा किया कि ममता बनर्जी ने सीधे I-PAC परिसर में जाकर जांच अधिकारियों से संबंधित सामग्री जब्त की। इसके अलावा, आरोप लगाया गया कि पश्चिम बंगाल सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल केंद्रीय एजेंसियों की जांच में बाधा डालने के लिए पैटर्न के तौर पर किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी को चुनावी कार्यों में दखल देने का अधिकार नहीं है, लेकिन यदि एजेंसी गंभीर अपराध की जांच कर रही हो, तो राज्य या राजनीतिक हस्तक्षेप उसकी शक्तियों में रुकावट नहीं डाल सकते। अदालत ने कहा कि कानून का राज बनाए रखना और एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से जांच करने देना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में संवैधानिक मर्यादाओं और कानून व्यवस्था की स्थिति की भी समीक्षा शुरू की। कोर्ट ने कहा कि बिना निष्पक्ष जांच के मामले को छोड़ना स्थिति को और गंभीर बना सकता है, जिससे अराजकता फैल सकती है। साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि तीन दिनों के अंदर सभी पक्ष अपना जवाब पेश करें।
ईडी की तरफ से दलील दी गई कि ममता बनर्जी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने कथित तौर पर CBI और ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा चल रही जांचों में दखल दिया। कोर्ट को बताया गया कि यह कोई अकेली घटना नहीं थी और ऐसे पैटर्न पहले भी देखे गए हैं। इसके अलावा, ED ने दावा किया कि I-PAC परिसर में चुनावी सामग्री को हटाने के बहाने एजेंसी की जांच को बाधित किया गया।
वहीं, ममता सरकार और उनके वकीलों ने इसे राजनीतिक आरोपों और मीडिया की अफवाहों के रूप में खारिज किया। सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिंघवी ने अदालत में कहा कि मुख्यमंत्री Z-श्रेणी सुरक्षा प्राप्त हैं और उनका I-PAC परिसर में जाना उनकी सुरक्षा जिम्मेदारी के तहत हुआ। उन्होंने जोर दिया कि ED की जांच के दौरान चुनावी दस्तावेज से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं था, इसलिए आरोप निराधार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से रिकॉर्ड किया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने दी जाए और किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से जांच प्रभावित न हो। साथ ही कोर्ट ने कहा कि प्रेस और मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक टिप्पणी जांच प्रक्रिया में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
इस मामले में अब तीन प्रमुख बिंदुओं पर निगरानी और समीक्षा जारी रहेगी: केंद्रीय एजेंसियों की जांच प्रक्रिया, राज्य सरकार का दखल और अदालत द्वारा जारी किए गए स्टे आदेश का पालन। अदालत का यह आदेश राजनीतिक और कानूनी तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकारों के बीच शक्ति और जिम्मेदारी के संतुलन से जुड़ा मामला है।